Friday, February 22, 2013

"तेरे संग होने का तज़र्रबा ,
 इक नन्हा, मौजिज़ा इतेहफाक़ था ...। 

 तेरे, न होने की खलिश.. 
 ता उम्र साथ चलती रही ...।।"

~ नंदिता (21/02/13) 

English Translation: 

"The experience of being with you..
 was a small miraculous co-incidence..!

The vacuum, that your absence creates,
walks beside me, all through my life..!!



"वो  कदम ,
 बर्फ की सतह पर,कभी
 चले थे जो साथ साथ ..।
 वक़्त की तपिश में ,
 पिघलते गए ..धुलते गए ..।।
  
 बर्फ की सुर्ख सफ़ेद चादर 
 जब भी पड़ती है उस राह पर  ..

 करा  देती है एहसास  
 यादों को चीरती ,चरमराती ,
 तेरे कदमों की आहट का ..
 यहीं कहीं ..यूँ ही आस पास ..!! "

~ नंदिता ( 20/02/13) 

 

Tuesday, November 27, 2012


"कुछ कुछ रूमानी सी  ...
 कुछ कुछ रूहानी सी ..
 नज़्म, ये तेरी-मेरी 
 गा रही है ज़िन्दगी  ..!!"

वो हर्फ़ जो गले में 
रुंधे पड़े हुए थे कई ..
आज उन्हें आवाज़,
दिला  रही है ज़िन्दगी ..।
हाँ ,  तेरा मेरा गीत 
गुनगुना रही है ज़िन्दगी ...।।  

वक़्त की बंदिश में 
एक लम्हा,
जो खो गया था कभी 
उस लम्हे को सोज़ 
बना रही है ज़िन्दगी ..।। 
हाँ ,
एक नयी सरगम 
गुनगुना रही है ज़िन्दगी।।

तेरी यादें जो महफूज़ थीं 
इक संदूक में कहीं ..
उन्हें खुली हवा में 
सहला रही है ज़िन्दगी ..। 
उनकी आज़ादी का जश्न 
मना रही है ज़िन्दगी .. ।।

कुछ कुछ रूमानी सी
कुछ कुछ रूहानी सी , 
हाँ , तुझे मुझे ..
इक सुफिआना रक्स में ,
झुमा रही है ज़िन्दगी ...।। 

~ नंदिता ( 27/11/12)


Wednesday, November 21, 2012

.... पतझड़- I ....

" पतझड़ में भी बहारें ढूँढता ,
यादों का कारवां ..
शब्दों का क्या कभी,
मोहताज रहा ..।। 

नज़रों ने ढूँढा था नज़रों को 
जिस तरह 
वो वाकया भी बेमिसाल रहा ..।


किताबों के पन्नों में ,
गुल न दबा था कभी कोई ..
स्मृतियों का गुलिस्ताँ
फिर भी आबाद रहा ..।।

क़दमों तले ,
सूखे चरमराते इन पत्तों में ,
ज़िन्दगी तेरी
तल्खीयों का एहसास हुआ .. ।

फिर भी, इस दिल ने,
यादों का गुलिस्ताँ समेटे ,
आज पतझड़ को
बहारों से आबाद किया ...।।

नंदिता ( 21/11/12 )







Saturday, November 10, 2012



कई बार ,
क्यों हो जाता है 
एक साधारण से
प्रश्न का उत्तर ,
इतना मुश्किल ...!

तुमने कितनी आसानी से
पूछ डाला," कैसे हो" .... 
और मैंने बरसों की 
खामूशियों को तोड़ते हुए 
कह डाला , " ठीक हूँ ". 

पर , 
इस "कैसे हो" से "ठीक हूँ "
के बीच बसी दूरियां बाँचते
इस सफ़र में,
तुम्हारा ये प्रश्न 
क्यों उमड़ता - घुमड़ता गया ..
क्यों मेरा ये उत्तर , 
घुलता गया, पिघलता गया ..


बरसों से पाली,
इस खामोशी को 
वैसे कहने के लिए,
था  बहुत कुछ ...

थे कई गिले शिकवे ..
थीं पेशानियों में कई यादें , 
जमी हुई सी ..।। 

थे कई प्यार भरे लम्हे भी  ,
गोशा, यादों के समुन्दर से ,
लहरें बन उमड़ पड़े हों ..।

एक याद थी,
आँसुओं से उमड़ी हुई ,
हाँ , एक पल भी था,
मोतियों सा बिखरा हुआ .. ।।

तुम्हारे उस
"कैसे हो"की सादगी  ,
है मुझे  निरुत्तर कर जाती ..

पर , तुम ही बताओ  , 
अपने इस "ठीक हूँ" की गहराई ,
मैं  हर्फों में कैसे बाँध पाती ..।।

~ नंदिता ( 10/11/12)


Thursday, October 18, 2012

मृगतृष्णा

सुरमई सी शाम ,
हौले से 
धरा को आकर थपकी दे गयी ..

दूर क्षितिज में होने लगा था ,
मिलन 
सूरज और धरा का ..
स्वप्न्मुग्ध सी मैं ,
जी रही थी उस पल को ..
साँसों को थामे हुए ..!

इन लम्हों के आगोश में ,
धरा और सूरज ,
थे लजाये - शर्माए से ,
एक दुसरे में लीन ..

मनमोहक सी यह छवि 
घुलने लगी एक दूजे में 
.. ,हौले से .. धीमे धीमे से ..।।

पर ,
मृगतृष्णा से परे ..

सदियों से चले आ रहे ,
काल चक्र के
इस घटना क्रम में ....
धरा और सूरज ..
..
..
क्या कभी एक हो पाए ..?

~ नंदिता ( 18 /10/2012 )


Thursday, October 11, 2012

यादें - 2


यादें .. 

साँसों  की बंदिशें समझाती रहीं 
कुछ सुलझाती रहीं ..
कुछ उलझाती रहीं ..।

ठंडी हवा के झोंकों में ..
तेरी खुशबु फैलाती रहीं ..
लबों में सरसराते हुए ..
गेसुओं में लहराती रहीं ..।


यादें ...

वक़्त की छावं में ,
ऐसा नूर फैलाती रहीं .. ।
फैसले जो बढ़ाते हैं फासले ..
हौले से ,
उनपर मलहम लगाती रहीं ..।         

यादें ..

तेरे मेरे दरमियाँ ..
हर्फों में डूबे , इन फासलों को ..
सहलाती रही ..
सिमटाती रहीं ... 
यादों में ही सही ..
इक साहिल बंधवाती रहीं ..।।

यादें  ..

अपनी तलहटी में ..
तेरे क़दमों की आहट का 
हैं एहसास कराती रहीं ..। 
देखो ,
उन तमाम मसलों को ..
ख़ामोशी से ,
कैसे हैं सुलझाती रहीं ...।। 


- नन्दिता ( 11/10/12)